Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 121, Verses 26–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 121, verses 26–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 26,27
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हिन्दी अर्थ
करोड सहवर दो श्लोक से वनों का ही विलासिनी के (स्त्री के) रूप से वर्णन करता हैं /
वनरूपी विलासिनी धन्य है । वन की मनोहर गन्ध ही इसका सुगन्धित निश्वास है । सुन्दर घनी
छाया ही शीतल अंग है, यह (वनभूमि) एकान्त में भगवदाकार को दिखलानेवाली है (और नायिका
एकान्त मेँ अपने रूप को दिखलानेवाली है) । भाँति-भाँति के आभूषणरूप पुष्पों से भरी है, वृक्षों
का निबिड विन्यास ही इसके वस्त्र है । निर (झरना) ही निर्मल हास है एवं इसने फूलों की सेज
बिछाई है । (वनभूमि ओर विलासिनी दोनों मे सब विशेषण लगाने चाहिये)