Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 122, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 122, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
जलकल्लोलविश्रान्तवातोत्सारितमूर्तयः ।
नीतानीताः क्षणेनैव योजनानां शतं शतम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके अनन्तर भगवान् अग्नि उनके सन्मुख
आकार धारण कर दृश्यमान हुए और उन्होंने उनसे कहा : 'हे पुत्रो, वर माँगो”