Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 122, Verses 9–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 122, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

आवर्तेषु तृणानीव भ्रान्ता विगतसंभ्रमम् । चिरं चञ्चलमत्ताभ्रचन्द्रमण्डलशोभिषु ॥ ९ ॥ मन्त्रविद्याबलौजोभिर्दुर्जयाः शस्त्रपाणयः । क्वचित्प्रमत्तैर्मकरैर्निगीर्णोद्गीर्णदेहकाः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

यह सब देखने के लिए हम श्रीअग्निदेव की प्रार्थना करे, उनके वरदान से इन सब दिशाओं को बिना परिश्रम के अन्त तक देखें । चार सागरो के तटों पर बैठे हुए उन सबने यह विचार कर एक ही साथ भगवान्‌ का आह्वान किया