Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 122, Verses 7–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 122, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
तमध्वानमथोहुस्ते जलधौ पादचारिणः ।
वितताध्यवसायेन बद्धकक्षाहरा इव ॥ ७ ॥
उन्नतावनतामद्रिसमारोहावरोहणैः ।
श्रियं वारितरङ्गाणां हरन्तो हरिमूर्तयः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
यह चारों ओर फैली हुई दृश्य शोभा कितनी
विस्तृत होगी । यहाँ से जम्बूद्वीप के बाद क्षार समुद्र है, क्षार के वाद फिर प्लक्षद्रीप-भूमि है, उसके
बाद फिर महान् (क्षार समुद्र से दुगुना बड़ा) इक्षुरस का समुद्र है, इक्षु-समुद्र के वाद कुशद्वीप है, कुशद्वीप
के बाद सुरा का सागर है । इस तरह क्रम से सात समुद्र और सात द्वीपो के बाद अन्त में क्या होगा ?
फिर उसके वाद क्या होगा ? यह दृश्यरूपिणी माया कितनी बड़ी और कैसी विचित्र वस्तुओंवाली
होगी ?