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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 122, Verses 17–20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 122, verses 17–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

घननिर्घातनिर्घोषभीषणार्णवघुंघुमात् । न भीता भूभृतस्तत्र वेलावलनजृम्भितात् ॥ १७ ॥ अभ्रंलिहजलाद्रीन्द्रपातोत्पातविघट्टिताः । क्षणं पातालमाजग्मुः क्षणमर्कास्पदं ययुः ॥ १८ ॥ अशङ्कितोत्पतद्वारिपूरपातपटावृताः । उत्पातपातनिपतद्वितानकवृता इव ॥ १९ ॥ प्रक्रान्तास्तेम्बुराशौ सहचरमकराः शूरनक्रैः कुलीरैर्व्याप्तावर्ताविवृत्ताः सलिलतरुलतासीकरैरन्तरालैः कुर्वन्तः कान्तियुक्तं वपुरिव कुसुमैर्भ्रान्तमाणिक्यमुक्तैर्व्यक्ताव्यक्तांशुजालैः प्रतिपदमितरैरभ्ररूपैरदभ्रैः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह वर देकर अग्निदेव चले गये, तदनन्तर रात्रि आई वह भी कुछ देर ठहरकर चली गई, तदुपरान्त सूर्य भगवान्‌ आये ओर उनकी विशाल सागर को लोँघने की इच्छा भी आई