Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 122, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 122, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
निवार्य सर्वं परिवारमात्रमाक्रन्दमानं वदनै रुदद्भिः ।
निरस्य चास्नेहतयाभिमानमात्सर्यलोभाभिभवैषणादि ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
उस समय
पद के क्रम के अनुसार निवासभूमि बनाकर उन्होने वहीं पर निवास किया ओर मजबूत मण्डलमर्यादा
की स्थापना की