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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 122, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 122, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । ततः प्रभाते प्रसभं पृथिव्याः कृत्वा यथाशास्त्रमलं व्यवस्थाम् । आविष्टदेहा इव ते रसेन निषेध्यमाना इव मन्त्रिमुख्यैः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुनायक, इसके बाद उन समुद्रतटों पर भूमिपर बैठ कर चारों विपश्चितं ने पहले मन्त्रियो दवारा निवेदित मण्डलमर्यादास्थापनरूप सारा राज्य प्रबन्ध किया

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ बीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इक्कीसवों सर्ग मण्डलमर्यादा की स्थापना कर अग्नि की शरण में गये हुए विपश्चितां का अग्नि के वरदान से दिगन्ता के दर्शन का उद्योग।