Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 122, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 122, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
विपश्चितस्ते दिशि दिश्यनल्पैर्भृत्यैः समुद्रं प्रविशद्भिरेव ।
भृत्यैश्च कैश्चित्त्वनुगम्यमाना ययुर्यथा वारिणि पद्भिरेव ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
रात्रि विस्तार को प्राप्त हुई और वे विपश्चित सारे दैनिक कृत्य पूर्ण करके सोने के लिए शय्याओं पर
आरूढ हुए ।