Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 122, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 122, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
तरङ्गजालेषु पदानि कृत्वा पृष्ठे स्थलस्येव जलस्य चान्तः ।
चत्वार एकैकतयैव युक्ता भृशं वियुक्ता निजसेनया ते ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
दूर से नदियों के प्रवाह के समान समुद्र तक पहुँचे हुए अतएव आश्चर्य में डूबे हुए उन्होने
नीचे कही जानेवाली बातों पर विचार किया