Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 123, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 123, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
मन्दराद्रौ मृदुतले मन्दारतरुमन्दिरे ।
किन्नरी मन्दरीनाम्नी दिनमेकमसेवत ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
मेघ के गर्जन की ध्वनि के सदृश भयंकर सागर के घुम-घुम शब्द से, जो कि तटभूमि में टकराने से
और तेज हुआ था, वे राजा होने के कारण (५) बिलकुल नहीं डरे