Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 123, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 123, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
क्षीरोदवेलावनकल्पवृक्षवनावलीनन्दनदेवताभिः ।
सार्धं समाः सप्ततिमप्सरोभिर्निनाय कामाकुलितोऽथ पूर्वः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश को छूनेवाले जलमय
पर्वतराजों के उछलने और गिरने से धक्कामुक्की मेँ पड़े हुए वे क्षणभर में पाताल पहुँचते थे और
क्षणभर में सूर्यमण्डल में पहुँच जाते थे