Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 123, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 123, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
क्षीरोदं प्राप्य मत्स्येन तेनोद्गीर्णः सुदुर्जरः ।
तेन क्षीरोदमुल्लङ्घ्य गतो दूरं दिगन्तरम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
वे चारों विपश्चित् रनेह की अधिकता से प्रत्येक दिशा में समुद्र में प्रवेश कर रहे बहुत से प्रजाजनों
(पालनीय लोगों) तथा सेवकों से अनुगम्यमान होते हुए स्थल के समान जल में भी पैरों से ही गये