Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 124, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 124, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
एकसंविन्मयाः सर्व एवैकवपुषोऽपि ते ।
विविधेच्छाः कथं ब्रह्मन्संपन्ना एकदेहिनः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
इस रीति से समुद्र और द्वीपों में जानेवाले वे चार विपश्चित् पैदल दृश्यरूप अविद्या के अन्त के
विचार में प्रवृत्त हुए
सर्ग सन्दर्भ
एक सी बाईसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तेईसवाँ सर्ग द्वीप और समुद्र में गये हुए विपश्चितों की पश्चिम की ओर गये हुए क्रम से विविध दशाओं का वर्णन।