Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 124, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 124, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एकसंविद्धनाकाशमप्यनानैव सर्वगम् ।
स्वयं नानेव संपन्नं सुप्ते चित्तमिवात्मनि ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
शरीर के छेद-भेद से रहित विपश्चितां ने समुद्र से द्वीप को, द्वीप से समुद्र
को इस प्रकार द्वीप, पर्वत और वन को शीघ्रता से लाँघा