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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 124, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 124, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

बहुबाहुर्यदा द्वाभ्यां हस्ताभ्यां ह्यर्थसंग्रहम् । करोति बहुभिर्भूयः संग्रामं सततं करैः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

फ़िर उत्तर की ओर चले विपश्चित्‌ का कृत्त कहते हैं / उत्तर विपश्चित्‌ वेग से बड़े-बड़े और छोटे-मोटे नदी-नाले तथा समुद्र पार कर स्वादिष्ट जलवाले महासागर के आगे प्रसिद्ध सुवर्णभूमि में सिद्ध के शापसे शिला बन गया