Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 124, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 124, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
उषितं गिरिमालासु भ्रान्तं सागरकुक्षिषु ।
विश्रान्तं द्वीपलेखासु निलीनं घनमालिषु ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
नारियल के फलों पर निर्वाह करनेवाला वह मेरुपर्वत
के उत्तर तरफ स्थित कल्पवृक्ष वन में दश वर्ष तक अप्सरा के साथ रहा