Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 124, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 124, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
शाकद्वीपोदयगिरितटे सप्तवर्षाणि सुप्तं पूर्वेणान्तर्विदलगहने यक्षसंमोहितेन ।
पाषाणाम्बु प्रसभममुनैवात्र पीत्वा दृषत्तामागत्यान्तः स्थितमथ समाः सप्त जात्येन भूमेः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
कोमल लताओं से भरे हुए मन्दराचल पर, मन्दार
वृक्षों के निकुंजरूप गृहों में मन्दरी नाम की किन्नरी ने उस पश्चिम विपश्चित् का एक दिन
तक सेवन किया