Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 125, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रसत्तासामान्ये विश्रान्तस्य निरन्तरम् ।
सर्वेशस्येह सर्वत्वं सर्वात्मत्वं च सर्वदा ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अणिमा आदि एश्वर्य की प्राप्ति से ईश्वरतुल्य हुए योगी एक ही समय
में असंख्य कर्मपूर्ण जगतों का निर्माण करते हैं और उनका अनुभव भी करते हैं