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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 125, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

वद केन कथं कुत्र कदा किमिव रोध्यते । सर्वगस्त्वथ सर्वात्मा यत्र भाति यदा यथा ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

एक ही विष्णु भगवान्‌ अपनी चार भुजाओं से अथवा अपने विभिन्‍न शरीरों से कहीं पर योगनिद्रा, कहीं पर तपस्या, कहीं पर इन्द्र के अनुज होने से उनकी सहायता, कहीं पर (वैकुण्ठ) विविध भोग-यों विविध क्रियाएँ करते हुए जगत्‌ की रक्षा करते हैं, वारांगनाओं का उपभोग करते हैं एवं उनका अनुभव भी करते हैं