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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, Verses 12–23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 125, verses 12–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 12-23

संस्कृत श्लोक

तथा भाति तदा तत्र सर्वात्मनि किमस्ति नो । अतीतं वर्तमानं च भविष्यत्स्थूलमप्यणु ॥ १२ ॥ तथा दूरमदूरं च निमेषः कल्प एव च । स्वरूपमजहत्येव सामान्ये तानि सर्वदा ॥ १३ ॥ सर्वात्मनि स्थितान्येव पश्य मायाविजृम्भितम् । अजातमनिरुद्धं च यथास्थितमवस्थितम् ॥ १४ ॥ विज्ञानघनमेवेदमत एव जगत्त्रयम् । नभस्त्वमत्यजंश्चैव सर्वात्मैव नभः स्थितम् ॥ १५ ॥ जगदात्मा जगद्रूपं द्रष्टृदृश्यतयोदितम् । विश्वात्मदृग्वपुर्यत्स्यात्तत्किं केन कथं कदा ॥ १६ ॥ दुःसाध्यं ब्रूहि तत्त्वज्ञ साध्यासाध्यस्वरूपिणः । तस्मादस्याः सदैकस्या विपश्चिद्राजसंविदः ॥ १७ ॥ प्रबोधमनुगच्छन्त्या अप्राप्तायाः परं पदम् । एकस्या अप्यनेकस्याः सर्वं सर्वत्र युज्यते ॥ १८ ॥ बोधाबोधात्मरूपे हि किं नामास्ति परात्मनि । अप्राप्तायाः परं बोधं पदार्थाकुलतोचिता ॥ १९ ॥ किंचिद्बोधं प्रविष्टायाः सिद्धताप्युचितैव सा । एवं ते सर्वदिक्संस्थाः सर्वमेव परस्परम् ॥ २० ॥ पश्यन्त्यनुभवन्त्याशु चिकित्सन्ते च संकटम् । बोधाकाशः स्वकाद्रूपादीषच्च्युत इवाशु चेत् ॥ २१ ॥ तदन्यतामिवादत्ते सुस्थितोऽपि यथास्थितम् । श्रीराम उवाच । विपश्चितः प्रबुद्धाश्चेत्कथं सिंहवृषादिताम् ॥ २२ ॥ दिक्षु यान्तीति मे ब्रह्मन्बोधाय कथयाश्वलम् । श्रीवसिष्ठ उवाच । प्रबुद्धाः कथिता ये ते योगिनस्ते मयानघ ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

समुद्रो के तटों में तथा नगरिया में क्रीडा की । पूर्वं दिशा को प्रस्थित विपश्चित्‌ शाकद्वीप में प्रख्यात उदयपर्वत के तटपर दलरहित स्नुहीवृक्ष के वन के अन्दर यक्ष द्वारा मोहिनी विद्या से मोहित होकर सात वर्ष तक सोया रहा पूर्व विपश्चित्‌ ही इस पर्वत पर कहीं पत्थर बना देनेवाला जल पीकर जवर्दस्ती पत्थर बनकर भूमि के अन्दर सात वर्ष तक रहा | पश्चिम दिशा की ओर प्रस्थित विपश्चित्‌ शाकद्रीपमें अस्ताचल पर्वत के शिखर पर मेघपूर्ण गुहारूपी गृह में पिशाचरूपी अप्सरा ने एक महीने तक अपना कामुक बना डाला | पूर्वं विपश्चित्‌ शान्तमय नाम के वर्ष (सप्त द्वीप) मे जलधार नाम के महापर्वत पर किसी मुनि के शाप से हरीतकी के वन में हरीतकी वृक्षता को प्राप्त होकर लोगों की दृष्टि में अदृश्य बनकर रहा । शिशिर नाम के वर्ष में रेवत नामक पर्वत पर पूर्वं विपश्चित्‌ यक्ष के वश में पड़कर दस रात्रियों तक सिंह हुआ | यहाँ पर पिशाचो की माया से छलित होकर सुवर्णपर्वत (सुमेरु) आदि की गुफाओं मे मेढक बना हुआ वह दस वर्ष तक रहा | उत्तर की ओर प्रस्थित हुआ विपश्चित्‌ कौमार वर्ष में पहुँचकर शाकद्वीप में नीलगिरि के तट पर अन्धे कूप में अन्धा मेढक बनकर सौ वर्ष तक रहा | पश्चिम की ओर चले हुए विपश्चित्‌ ने मरीबक वर्ष में विद्याधरता प्राप्त करानेवाली विद्या से चौदह वर्ष तक विद्याधरता प्राप्त की