Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, Verses 2–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 125, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 2, 3
संस्कृत श्लोक
अमोहा मोहवलिता दृश्यन्ते तत्त्वदर्शिनः ।
इदं सुखमिदं दुःखमित्यादिकलनास्तु ताः ॥ २ ॥
पाश्चात्यः शिशिरे वर्षे पाषाणत्वमुपागतः ।
मोचितो दक्षिणेनाशु गोमांसादिप्रयोगतः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
एक जीव की भी अविद्यावश स्वप्न में नाना शरीर कल्पना देखी जाती है और उनमें शत्रुता, मित्रता
ओर उदासीनता की कल्पना होने पर विभिन्न इच्छाएँ दिखाई देती हैं तथा सर्ग के आदि में ब्रह्मरूप
जीव में जाग्रत अवस्था में भी नाना शरीर कल्पनारूप कर्म ही है, अतः सब कुछ सम्भव है इस आशय से
श्रीवसिष्ठजी उत्तर देते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जैसे स्वप्नावस्था में चित्त अपने में ही गिरि, समुद्र, नदी आदि
के रूप से नाना-सा होता है वैसे ही केवल साक्षिचैतन्य घनाकाश सर्वव्यापी अनाना (अखण्ड) ब्रह्म ही
मायावश नाना-सा (भिन्न-सा) बन गया है। जैसे अतिस्वच्छ दर्पण के उदराकाश में गिरि, नदी आदि
के साथ महाकाश प्रतिबिम्बित होता है वैसे ही संवित्मय आकाश के (साक्षिचैतन्य के) दर्पण के समान
अतिस्वच्छ होने के कारण, नानात्मता को जैसा प्राप्त हुआ आत्मा स्वयं ही अपने में प्रतिबिम्बित होता
है । उस प्रकार अतिस्वच्छ संवित्मयआकाश के जगदाकार होने में दर्पण की-सी अतिनिर्मल स्वच्छता
ही कारण है