Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 125, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

शिवेऽस्ताचलपारस्थे वर्षे वर्षेण पश्चिमः । मोचितो दक्षिणेनैत्य गोपिशाच्या वृषीकृतः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जगत्‌ भी वस्तुतः चित्‌ ही है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है। ऐसी स्थिति में चित्‌ का ही चित्‌ में प्रतिबिम्ब कैसे पडेगा ऐसी यदि कोड शंका करे तो उस पर दृष्टान्त सुनो, ऐसा कहते हैं। जैसे एकमात्र लोहे के बने हुए दर्पणों का आपस में एक दूसरे पर प्रतिबिम्बि पड़ता है वैसे ही परमार्थतः चिद्रूप भी ये पदार्थ आपस में प्रतिबिम्बित होते हैं। मायारूप उपाधि की शक्ति अचिन्तनीय (विचारसीमा के परे) है, अतः गन्धर्वनगर, स्फटिक की दीवाररूप आकाश में चन्द्रमा, सूर्य ओर मेघ सहित महाकाश का भी प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, यह भाव है