Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 125, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अत्रैव क्षेमके वर्षे आम्बिकेयगिरौ तरौ ।
दक्षिणो यक्षतां यातो मोक्षं यक्षेण लब्धवान् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव अध्यस्त भोग्य जगदाकारः ब्रह्म विषय और इन्द्रियों का संयोग होने पर बुद्धि अवच्छिन्न
जीव के प्रति अप्रिय विषय भोग के आकार से प्रतिबिम्बित होता है, ऐसा कहते हैं।
इसलिए जब जिसकी जो-जो भोग्य वस्तु, एकमात्र चिद्घनस्वभाव होने से, इन्द्रियसन्निकर्ष को
प्राप्त होती है-बुद्धि में प्रतेबिम्बित होती है- उस वस्तु से वह उसके भोग के लिए समर्थ होता है। यदि
भोग्यवस्तु बुद्धि में प्रतिबिम्बित न हो तो भान ही न हो, यह भाव है