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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 125, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । एकदेशगता विष्वग्व्याप्य कर्माणि कुर्वते । योगिनस्त्रिषु कालेषु सर्वाणि भगवन्कथम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी कारण विपश्चितों के नाना दिशाओं में भोगयोग्य पदार्थो के एक ही समय भोग देनेवाले कर्म का परिपाक होने पर एक ही देह चार प्रकार की हो गई तथा तत्‌-तत्‌ देश के विषयों का तत्‌-तत्‌ बुद्धि में प्रतिबिम्ब भी पड गया, इस आशय से कहते हैं। इस कारण जिस विपश्चित्‌ के सामने जो वस्तु आई उससे वह संवित्मयता को प्राप्त होकर उसके वश में हो गया