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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 27–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 27,28

संस्कृत श्लोक

लोकालोकशिरःप्राप्तं तारकामार्गसंस्थितम् । अधःस्थिता अपश्यंस्तमुच्चनक्षत्रशङ्कया ॥ २७ ॥ तस्मात्प्रदेशात्तत्पारे तमस्तस्य महागिरेः । चतुर्दिक्कं महाखातं नभः शून्यमनन्तकम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे महाबाहो, वे विपश्चित्‌ अत्यन्त प्रबुद्ध न थे, वे बोध ओर अबोध के बीच में दोलायमान-से स्थित थे । अर्धप्रबुद्ध उनमें मोह के चिह भी ओर चारों ओर बन्धन के चिह्न भी दुष्टिगोचर होते है । पूर्वोक्त दोलायित धारणा से विपश्चित्‌ परम ब्रह्म को प्राप्त योगी न थे, किन्तु अग्नि की प्रसन्नता से सिद्धि प्राप्त होने के कारण धारणायोगी थे, जिनमें अविद्या का विनाश हो गया, ऐसे ज्ञानयोगी न थे ॥ २४-२ ६॥ हे कमलनेत्र श्रीरामजी, जो परम ज्ञान को प्राप्त हो चुके ओर जिनमें अविद्या का नाम-निशान नहीं हे ऐसे ज्ञानयोगी वे विपश्चित्‌ होते तो वे अविद्या को क्यों देखते ? अविद्या दर्शन की इच्छा ही इनके अविद्या के अनुच्छेद में हेतु हे । धारणा के पुष्ट होनेपर अग्निदेव के प्रसाद से जन्य वर से प्राप्त सिद्धिवाले वे विपश्चित्‌ धारणायोगी थे । उनमें अविद्या विद्यमान थी, अतएव वे आत्मविचार विहीन थे