Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 35
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हिन्दी अर्थ
यदि बन्ध और मोक्ष मन के धर्म हैं, तो आत्मा बद्ध है आत्मा मुक्त हआ” यों शास्त्र में कैसे व्यवहार
होता है ? इस प्रश्नपर कहते हैं।
स्वानुभवप्रदान करनेवाला आत्मा मन के धर्म सुख-दुःखों से युक्त होकर जीवरूप से बन्धन की
अनुभूति करता है, वही उसकी (मन की) मुक्ति होने पर शास्त्र में मुक्त कहा गया है ॥ ३ ४॥
यदि यह बात है तो देह आदि भी मन के धर्म खुख-दु:खों से बद्ध और मुक्त माने जायेंगे ? इस
आशंका पर कहते हैं।
जिसका अन्तरात्मा आहलादयुक्त हो वही मुक्त कहा जाता है और जिसका अन्तरात्मा सन्तप्त
हो वह बद्ध कहलाता है, अतः मनके धर्म सुख-दुःखवश देह के बन्धन ओर मोक्ष नहीं हँ । भाव यह कि
आभ्यन्तर आनन्द ओर सन्ताप का आन्तर ही चिदात्मा में अध्यास अनुभवसिद्ध है, अतः उसी में उसे
मानना उचित है, बाह्य देह आदि में उसे मानना ठीक नहीं है