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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verse 36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 36

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जैसे शरीर संयोगी मन में शरीर के धर्मो की प्राप्ति होती है वैसे ही मनोधर्म मोक्ष की भी शरीर में प्रतीतिप्रसक्तिहो सकती है, इस आशय से कहते है। शरीर के टुकड़े-टुकड़े किये जायें अथवा उसे राज्यसिंहासन पर वैठाया जाय दोनों अवस्थाओं में रो रहे अथवा हँस रहे जीवन्मुक्त पुरुष के अन्दर न तो कुछ शरीरस्थित दुःख होता है ओर न सुख होता हे