Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 40–43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verses 40–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 40-43
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हिन्दी अर्थ
तत्त्वदर्शी लोग वीतराग होने पर भी अनुरक्त जैसे, कोपविहीन होने पर भी कोपयुक्त जैसे तथा
मोहरहित होने पर भी मोहयुक्त जैसे दीखते हैं यह सुख है यह दुःख हे, ऐसी कल्पनाएँ तो उनसे
इस प्रकार अत्यन्त दूर रहती हैं जैसे कि आकाश से अंकुर दूर रहते हैं अर्थात् जैसे आकाश में अंकुरों
का संभव नहीं हे वैसे ही उनमें सुख दुःख कल्पनाओं का संभव नहीं है । जगत् का स्वरूप और
तन्मूलक अज्ञान जिसकी दृष्टि में हे ही नहीं केवल एक आनन्द स्वरूप (सत्) ही जिसकी दृष्टि में
सब कुछ है उस जीवन्मुक्त पुरुष को भी सुख दुःखादि होते हैं, यह कहना आकाश की भी शाखाएँ
होती हैं यह कहने की तरह व्यर्थ हे । “सर्वत्र एकत्व की प्रतीतिवाले उस जीवन्मुक्त को शोक मोह
कहाँ हो सकते हैं ? इस श्रुति वाक्य के अनुसार शोकमोह को जीतनेवाले अतएव शोकमोहविहीन
ही जीवन्मुक्त शोक करते हैं । तत्त्वदर्शी लोग शिर आदि अंगों का छेदन होने पर भी अच्छिन्न हो
अद्वितीय आत्मा में परायण देखे जाते हें