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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 44–45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verses 44–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 44,45

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

ऊँचे स्वर से सामगायन में तत्पर ब्रह्माजी के शिर को भगवान्‌ शंकर ने अपने नख से कोमल कमल के समान काट डाला । समर्थ होने पर भी ब्रह्माजी ने उस सिर को (पंचम सिर को) फिर उत्पन्न नहीं किया । ब्रह्म तो आकाशसम है, अतः मिथ्यारूप पाँचवे सिर से उनको क्या प्रयोजन है