Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 46–47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verses 46–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 46,47
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हिन्दी अर्थ
तो उनका वार मुखो से वेदोपदेश करने का क्या प्रयोजन है ? इस प्रश्न पर कहते है ।
न तो उनका यहाँ कर्म से कोई प्रयोजन है ओर न अकर्म से कोई प्रयोजन हे । जो वस्तु प्राणियों के
कर्मवश जैसे सम्पन्न हो गई वह वैसे ही रहे अन्य से क्या प्रयोजन है ? देखिये न ईश्वर का भी प्राणियों
के कमनुसार ही व्यवहार है, अपने लिए नहीं । भगवान् श्रीशंकरजी, अनुगृहीत कामदेव से हरिणाक्षी
देवी को अपने अधगि में ऐसे ही धारण करते हैं जेसे क्षीरसागर अपने अन्दर गुप्त चन्द्रमा की कला को
धारण करता हे, कामदेव का निग्रह होने से उपद्रवविहीन समाधि में प्रवृत्ति होने के कारण अपने शरीर
में वैसे आनन्दाश्रु धारण करते हैं जैसे समुद्र अपने अन्दर चन्द्रकला को धारण करता हे