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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 55–62

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verses 55–62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 55-62

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

दिननायक सूर्य अपने शरीर को रोकने के लिए समर्थ नहीं हैं सो बात नहीं है। फिर भी निष्काम जीवन्मुक्त सूर्य पूर्व से वधी हुई अपनी मर्यादा के अनुसार ही रहते हैं, सदा भ्रमण करते रहते हैं । चन्द्रमा कल्पान्त तक रहनेवाले राजयक्ष्मा का, जो कभी नष्ट नहीं होता, व्यर्थ ही अनुभव करता है जीवन्मुक्त होने के कारण बिना किसी दुःख-पीड़ा के जैसी मर्यादा बँध गई वैसे ही स्थित है, उसकी निवृत्ति के लिए किसी प्रकार का प्रयत्न नहीं करता है । राजा मरुत्त के यज्ञ में लगातार बारह वर्ष तक हाथी की सूँड-सी मोटी निरन्तर गिर रही घी की धारा आदिरूप हविष के भक्षण से उत्पन्न हुए अजीर्णं से तथा स्वामी स्कन्द की उत्पत्ति के सिलसिले में भगवान्‌ शंकर का भगवती पार्वतीजी के समागम के समय देवताओं द्वारा विघ्न करने पर अपने स्थान से विचलित हए वीर्य को ब्रह्मा के कहने-सुनने से निगलने के कारण हुए अन्तर्दाह आदि से अग्नि खिन्नता को धारण करता है । पूर्व धी हुई स्थिति का (मर्यादा का) कदापि त्याग नहीं करता । देवगुरु ओर असुरगुरु, बृहस्पति तथा शुक्राचार्य यद्यपि जीवन्मुक्त हैं तथापि भाँति-भाँति की परस्पर विजयेच्छाओं से कृपण जैसे (अज्ञानी जैसे) रहते हैं । जीवन्मुक्त मुनि ऐसे राजा जनक जगत्‌ में भीषण-भीषण युद्धो मेँ अपने शरीर को क्षत-विक्षत करते हुए राज्य करते हैँ । महाराज नल, मान्धाता, सगर, दिलीप, नहुष आदि यद्यपि जीवन्मुक्त थे, फिर भी उन्होने आकुलित ऐसे हो चिरकाल तक राज्य किया व्यवहार में जैसे ही अज्ञानी है, हूबहू वैसे ही ज्ञानी भी है । वासना ओर अवासना ही बन्धन और मोक्ष मेँ कारण है । राजा बलि, प्रह्लाद, नमुचि, वृत्रासुर, अन्धकासुर, मुर आदि जीवन्मुक्त थे, वीतराग थे फिर भी उन्होने रागियों का-सा व्यवहार किया था