Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 65
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हिन्दी अर्थ
तत्त्वसाक्षात्कार से जीवजगत भेद कैसे बाधित होता है, ऐसी यदि किसी को आशंका हो तो वह
केवल भ्रान्ति से सिद्ध है इस आशय से उसकी अवास्तविकता को दृष्टान्त से सिद्ध करते हैं।
जैसे शून्य (७) इन्द्रधनुष नाना-सा प्रतीत होता है वैसे ही यह दृश्यरूप भ्रम आभासमात्र है,
वास्तविक नहीं है