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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 67–68

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verses 67–68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 67,68

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

आकाश में शून्यत्व की तरह प्रकटता को प्राप्त हुआ, न कभी उत्पन्न हुआ और न कभी नष्ट हुआ यह असत्‌ जगत्‌ सत्‌-सा प्रतीत होता है। जगत्‌ सादि ओर सान्त होने पर भी अनादि ओर अनन्त, अशून्य होने पर भी शून्य, उत्पन्न होने पर भी अनुत्पन्न ओर नष्ट होने पर भी अनष्ट ही हे । नित्य, कूटस्थ, असंग, अद्वितीय वस्तु के जगत्रूप ग्रहण करने पर उसमें आदि-अन्त की (जन्मनाश आदि की) प्रसक्ति नहीं है, यह भाव है