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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 69–70

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 126, verses 69–70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 69,70

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जगत्‌भाव के समान जगत्‌ के जन्मनिरोधभाव की भी ब्रह्म में कल्पना से ही उपपत्ति है, ऐसा यदि कहो तो इष्टापत्ति है, क्योंकि कल्पनामात्र से उसकी कूटस्थता की क्षति नहीं हो सकती है, इस आशय से कहते हैं। उत्पन्न हुआ, नष्ट हुआ है, यों ब्रह्माकाश ही प्रतीत होता है जैसे काष्ठमयस्तम्भ काष्ठ ही है और जैसे स्तम्भ के एक हिस्से में बनाई गई प्रतिमा भी काष्ठ ही है वैसे ही ब्रह्म मेँ कल्पित यह ब्रह्म ही है। समस्त कल्पनाओं से रहित, निद्राशून्य, सम केवल आत्मरूप से अवस्थितिरूप जो चिदाकाश है, समाधिदृष्टि से तन्मात्र ही जगत्‌ को जाने । यानी समाधिदृष्टि से कल्पनाविहीन जगत्‌ ब्रह्म ही है यों अनुभव में बैठाये