Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 127, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 24
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हिन्दी अर्थ
उस भूमि के बीच में मरकर वह विपश्चित् वैसे ही
देवत्व को प्राप्त हुआ जैसे अग्नि के मध्य में पड़ा हुआ काठ क्षणभर में अग्निता को प्राप्त हो जाता
है