Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verses 19–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 127, verses 19–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 19-23
संस्कृत श्लोक
नक्षत्रचक्राद्द्विगुणं ततोऽन्यद्विद्यते नभः ।
तच्च क्वचित्प्रकाशाढ्यं क्वचित्सान्द्रतमोमयम् ॥ १९ ॥
पर्यन्ते तस्य नभसः स्थितं ब्रह्माण्डखर्परम् ।
एकमूर्ध्वे परमधो गगनं मध्यमेतयोः ॥ २० ॥
योजनानां कोटिशतं पुष्टं वज्रदृढं च तत् ।
स्थितं संवेदनमयं व्योम्नि व्योममयात्मकम् ॥ २१ ॥
सर्वदिक्कं महागोले नभसि स्वर्कतारकम् ।
किमत्रोर्ध्वमधः किं स्यात्सर्वमूर्ध्वमधश्च वा ॥ २२ ॥
पतनमुत्पतनं गमनं स्थितं चित इति स्फुरितं न तु वस्तु तत् ।
पतनमस्ति न चोत्पतनं न वा गमनमागमनं स्थितमित्यपि ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
शंका - यह कथन ठीक नहीं है, क्योकि चारों शरीरो में एक ही विपश्वित्-जीव जैसे योगी का एक
ही जीव कायदव्युहों मे विभक्त होकर रहता है वैसे ही विभक्त होकर स्थित था, उसकी पश्चिम विपश्चित्-
शरीर में विष्णु भगवान् की प्रसन्नता से मुक्ति होने पर कौन दूसरा पूर्व विपश्चित् शरीर में चन्द्र की
उपासना द्वारा चन्द्रजोक को जायेगा, एक ही जीव की कहीं पर मुक्ति और कहीं पर बन्धन एक ही साथ
किसी प्रकार सम्भव नहीं है, क्योकि ऐसा मानने से मुक्तिरूप फल पाक्षिक और परिच्छिन्न हो जायेगा ।
यह भी सम्भव नहीं है कि एक जीव यदि चार शरीर धारण करे तो उसके चार जीव हो जायेंगे अथवा
अन्य जीवो की उत्पत्ति हो जायेगी, क्योकि प्रथम पक्ष में यानी चार विभाग मानने पर पूर्व जीव के नाश
की आपत्ति आयेगी। दूसरे पक्ष में नये उत्पन्न हुए जीवों को काम, कर्म, वासना आदि बीज के अभाव में
संसारप्राप्ति नहीं होगी। यदि कहो कि जैसे भोगवैचित्र्य का कर्मों द्वारा या माया से बिना किसी विरोध
के निर्वाह हो सकता है, ऐसा नहीं कह सकते क्योकि प्रथम तो मोक्ष कर्माधीन नहीं है, दूसरे मोक्ष में
सकलमायानिवृत्ति का प्रतिपादन करनेवाली श्रुति से विरोध आयेगा।
समाधान: ठीक है, यहाँ पर भगवान् श्रीवसिष्ठजी का ऐसा आशय प्रतीत होता है कि जीव ब्रह्माकाश
से अतिरिक्त कुछ नहीं है। बरह्म ही अन्तःकरणरूप उपाधियों में माया द्वारा विभक्त होकर अन्तःकरणगत
काम, कर्म और वासना के अनुसार संसारी-सा मालूम पड़ता हुआ जीव कहा जाता है । अन्तःकरण
दीपक की तरह बहुतों को मिलाने से एक और विशाल होता है। एक ही अन्तःकरण योग, देवता आदि
के अनुग्रह आदि निमित्त से एक ही काल में विरुद्ध अनेक प्रदेशों में भोगने योग्य कर्मो का उद्गम होने के
कारण अनेक भी हो सकता है । जब बहुत से जीवों का समान देश और काल मे भोगने योग्य एक समान
काम, कर्म ओर वासना का उदय होता है तब भोग के लिए मेल न होने पर एक जीवत्व ही होता है जब
तक विरुद्ध देश मे भोग के कारण कर्म का उदय न हो तब तक लाघव से भोगायतन (भोगस्थान) एक ही
शरीर रहता है । जैसे युधिष्ठिर- जीव धर्म और इन्द्र के मेल से एक जीव रहा, जैसे भीम-जीव वायु ओर
इन्द्र के मेलन से एक जीव रहा, जैसे अर्जुन-जीव इन्द्र ओर नर के मेलन से एक जीव हुआ, जैसे
नकुल-सहदेव का इन्द्र ओर अश्विनी कुमारो के मेलन से एक जीव हुआ तथा जैसे द्रौपदी का नारायणी,
लक्ष्मी ओर गौरी के अशो के मेलन से एक जीव हुआ यह बात पंचेन्द्रोपाख्यान आदि के पर्यालोचन से
प्रसिद्ध है। अथवा जैसे अग्नि ओर वायु का इन्द्र के शापवश अगस्त्य अवतार में मेलन से एक जीव हुआ
इत्यादि और भी अनेक घटनाएँ है । एक जीव की, अनेक उपाधियों मे विभाग होने से, अनेकजीवता भी
सम्भव है । कश्यप से अपने गर्भ में इन्द्रविनाशक पुत्र को पाकर अपवित्रता के साथ सोई हुई दिति के एक
जीववाले एक शरीर के गर्भ के पहले सात टुकड़े करने पर सात जीव हुए तदुपरान्त एक-एक टुकड़े के
सात-सात खण्ड करने पर उत्पन्न हुए उनचास मारुतो के उनचास जीव हो गये । बरगद, ईख, दूब
आदि के काण्ड, शाखा और टहनियो मे से प्रतिशाखा और प्रतिकाण्ड पनप उठते हैं, इससे ज्ञात होता
है कि एक जीव का नाना जीवरूप से ओपाधिक विभाग खूव प्रसिद्ध है ही । इस प्रकार प्रकृत मे भी चार
जीवों के जब तक समान (एक से) काम, कर्म ओर वासना आदि रहे तब तक उन्होने एक देह से राज्य
का पालन किया । जव विरुद्ध भिन्न देश में भोगने योग्य काम, कर्म आदि का उद्भव हुआ तब उनका
देह आदि के विभागपूर्वक भिन्न-भिन्न दिगन्तो में भ्रमण हुआ ऐसी कल्पना करने मे अथवा एक ही
विपश्चित् जीव के उपाधिविभाग से उनचास मरुतों की भाँति चार जीव हुए ऐसी कल्पना में भी एक की
मुक्ति होने पर सब की मुक्ति का प्रसंग नहीं होगा।
यदि कोई कहे कि बहुत जीवों के मेलन से एक जीव का आरम्भ होने पर उस नवीन जीव को
कर्मो के अभाव में संसार प्राप्ति न होगी यह भी नहीं कह सकते, क्योकि आरम्भवाद से नवीन जीव
की उत्पत्ति नहीं मानी जाती है । गंगा और यमुना के जल को मिलाने से दोनो के एक होने पर नूतन
गंगा की बुद्धि न होने से वही यह गंगा है ऐसी प्रत्यभिज्ञा में कोई बाधा नहीं आती । इसी प्रकार एक
जीव के चार जीव बन जाने पर प्रत्यभिज्ञा से दो उपाधिर्यो के मिलकर एक हो जाने पर उपहितो का
भी मिलकर एक हो जाना सकल प्रतीतिसिद्ध है । एक होने से भी प्राक्तन कर्मभोग हो सकता है । इस
प्रकार एक जीव के चार जीव बन जाने पर प्रत्यभिज्ञा से चारो का प्राक्तन जीव के साथ अभेद होने से
उसके काम, कर्म ओर वासनाओं का चार प्रकार से विभाग से व्यवस्था होने के कारण उनके संसार
की उपपत्ति तथा एककी मुक्ति होने पर भी दूसरे को ज्ञान न होने से संसार-प्राप्ति होती है । इस
प्रकार मुक्तिरूप फल वैकल्पिक तथा परिच्छिन्न ठहरेगा । जैसे व्यष्टि जीवों की मुक्ति होने पर भी
समष्टि हिरण्यगर्भरूप जीव की अधिकार की समाप्ति में मुक्ति होती है वैसे ही यहाँपर भी व्यवस्था
उपपन्न है । समष्टि जीवरूप हिरण्यगर्भ का तत्त्वज्ञान व्यष्टि जीवों की मुक्ति न होने पर वैकल्पिक
तथा परिच्छिन्न मोक्षरूप फलवाला नहीं माना जाता है । जहाँपर व्यष्टि ओर समष्टि के अभेद के
रहते भी मुक्तिसंकर नहीं है वपर वर्तमान जीवभेद होने पर केवल प्राचीन जीव के अभेदमात्र से
मुक्तिसंकर की आपत्ति का अवसर ही कहाँ है । भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्ति:”
(स्वात्मज्ञानप्राप्तिकाल में सुख, दुःख मोहरूप सकल प्रपंचरूप माया की निवृत्ति हो जाती है) यह
श्रुति भी तत्-तत् जीवों की उपाधिभूत सकल बीजों की निवृत्ति का प्रतिपादन करती है । अन्यथा
एक की मुक्ति से ज्ञानविहीन सकल जीवों की मुक्ति का प्रसंग प्राप्त होगा और तद् यो यो देवानां
प्रत्यबुद्धयत स एव तदभवत् तथर्षीणां तथा मनुष्याणाम्” (देवताओं में जो जो आत्मज्ञानी हुआ वह
वह ब्रह्म (मुक्त) हुआ, ऋषियों में जो जो प्रदुद्ध हुआ वह मुक्त हुआ और मनुष्यों में जो जो आत्मज्ञानी
हुआ वह मुक्त हुआ), (बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः“ (बहुत से लोग ज्ञानरूपी तपस्या से
पवित्र होकर मत्स्वरूपता को प्राप्त हुए हैं ) इत्यादि अनेक श्रुतियाँ और स्मृतियाँ व्यर्थ हो जायेगी ।
यदि कोई कहे कि तब तो आधुनिक मन्द अधिकारी भावी अनेक जन्मो से प्राप्त होने वाले मोक्ष की
आशा से साधनों का अनुष्ठान नहीं करेगा, क्योंकि उसे यह आशंका रहेगी कि मुझ एक जीव के
अनेक जीव होने से कहीं पर मोक्ष होनेपर भी कहीं पर बन्धनानुवृत्ति की निवृत्ति न होगी ऐसी स्थिति
में अनिर्मोक्ष शंका की निवृत्ति न न होगी। ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योकि मोक्षसाधन के अनुष्ठान में
प्रवृत्ति होती है, स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्” (इस धर्म का थोड़ा भी अंश महान् भय से
रक्षा करता है), (नहि कल्याणकृत् कसिचद् दुर्गीतें तात गच्छति', (अनेकजन्मसंसिद्धरततो याति परां
गतिम्” (अनेक जन्मो में सिद्धि को प्राप्त होकर तब परम गति को, मुक्ति को प्राप्त होता है), इस
स्मृतिरूप प्रमाण के अनुरोध से आनेवाले जन्मो मेँ नाना जीव रूप से अविभाग का अथवा विभाग
होनेपर भी साधन संस्कारों के साथ ही विभाग से सर्वत्र क्रमशः अवश्यमेव ज्ञानोदय का अनुमान होने
से साधनों के अनुष्ठान में प्रवृत्ति की उपपत्ति होती है । उसी प्रकार भिष्चुजीवटोपाख्यान के
साधनानुष्ठानवाले भिक्षु के प्रमादवश हुए संकल्पो से प्राप्त नानाजीवता के अन्त में शतरुद्रभाव होने
पर उसके विभागरूप सब जीवो की ज्ञानप्राप्ति ओर मुक्ति का वर्णन है । यदि कोई कहे इस प्रकार
सर्वजीवों की मुक्ति की अनापत्ति हो जायेगी, यह इष्टापत्ति ही है / क्योकि मायाद्वष्टि से माया की
अनन्तता की “न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सप्रतिष्ठा" (नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया
सर्वमिदं ततम् ।* इत्यादि स्मृतियों से सिद्ध है । तत्तवद्ष्टि से तो जीव ही नहीं है, ऐसी अवस्था में
किसकी मुक्ति की अनापत्ति होगी ? यदि कहो कि “अतोऽन्यदार्तम्” इस श्रुति से विरोध आयेगा सो
भी नहीं कह सकते, क्योकि उस श्रुति की केवल एक व्यक्ति की आर्ति से भी उपपत्ति हो जायेगी ।
प्रवाह की अनन्तता में भी कोई विरोध नहीं आयेगा चरम व्यक्ति का नाश ही प्रवाहनाश है । सर्वजीव
रूप संसार का चरम व्यक्ति ही प्रसिद्ध नहीं है, उसके नाश की प्रसिद्धि करटो से होगी ? प्रस्तुत में एक
ही पश्चिम विपश्चित् को भगवान् की भक्ति के परिपाक से उत्पन्न हुए भगवान् के प्रसाद से ज्ञानप्राप्ति
हुई औरों को नहीं हुई, इस कारण केवल उसीकी मुक्ति हुई । इसमें कुछ भी अनुपपत्ति नहीं है ।
तदुपयन्त दक्षिण विपश्चित् ने क्या किया ? इस संशय के उत्तर में कहते है।
राजन्, दक्षिण दिशा को प्रस्थित विपश्चित् अपने शत्रुओं को मटियामेट कर आज भी शाल्मली
द्वीप में राज्य करता है, कारण कि परमार्थ सत् वस्तु के लाभ से बाह्य पदार्थों का निश्चय उसे विस्मृत
नहीं हुआ । उत्तर की ओर प्रस्थित विपश्चित ने चंचल तथा आकाश की ओर उछलने वाली कल्लोलों
से पूर्ण स्वादूदक सागर में एक हजार वर्ष तक मगर के पेट में निवास किया । मगर के पेट के मांससे
अपनी गुजर करनेवाला वह मगर के मरने के बाद सागर से ओर मगर के पेट से मगर के समान बाहर
निकला । तदनन्तर हिम के समान स्वच्छ जलवाले स्वादूदक सागर के अवशिष्ट अस्सी हजार योजन
पारकर विशाल उदरवाली दस हजार योजन की सुवर्णमय महाभूमि में जहाँ देवता लोग विहार करते हे,
प्राप्त हुआ वहींपर उसकी मृत्यु हो गई