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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 127, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

संविद्धनस्य कचनं यादृशं कल्पनात्मकम् । यदित्थं संनिवेशेन नन्वियं जागती स्थितिः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्व दिशा की ओर चला हुआ विपश्चित्‌ पर्व में (पूर्णिमा के दिन) पूर्ण चन्द्रमा के बिम्ब के पास अपने शरीर का चिरकाल तक (जब तक उसमें चन्दरत्व की प्राप्ति नहीं हुई तब तक) चन्द्रमा के समान ध्यान कर पूर्वशरीर के नष्ट हो जाने से चन्द्रलोक में स्थित हुआ