Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 127, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
द्विगुणा नभसस्तस्मादृक्षचक्रस्य पुष्टता ।
दशदिक्कं विसरतो बिल्वत्वक्सदृशस्थितेः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
देहभाव का परित्याग कर वीतहव्य के उपाख्यान में वर्णित रीति
से चित्त के सन्मात्ररूपता को प्राप्त होने पर (असत्ता एसा छेद करने पर चित्त के विलीन होने पर यों
अर्थ करना चाहिये) वह विपश्चित् वैसे ही परम निर्वाण को (केवल्य मोक्ष को) प्राप्त हुआ जैसे कि
उसका प्राण आकाशता को (शून्यता को) प्राप्त हुआ । यह षोडष कलाओं का उपलक्षण है, क्योकि
गताः कलाः पंचदश प्रतिष्ठाम्“ ऐसी श्रुति है