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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verses 14–16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 127, verses 14–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 14-16

संस्कृत श्लोक

आपातालदिवो नद्धमृक्षचक्रं तदम्बरे । दशदिक्कं प्रसरति पतदूर्ध्वादृतेऽभितः ॥ १४ ॥ भूलोकमेव पातालयुतं नक्षत्रमण्डलम् । पर्येति लोकालोकान्ते नान्यच्चित्कल्पनाच्च तत् ॥ १५ ॥ सलोकालोकभूलोकद्विगुणात्खादनन्तरम् । पक्वाक्षोटस्य भिस्सेव स्थितं नक्षत्रमण्डलम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

दृश्य और दर्शन में से पृथिवीमण्डलरूप अनुभवाकार अविद्या का इतनी बड़ी है यों परिच्छेद को (परिमाण को) देखने के लिए द्वीप द्वीपान्तरों मे भटके । पश्चिम विपश्चित को सात महासमुद्रो के साथ सात द्वीपों को लाँघकर भाग्योदय वश पूर्व वर्णित स्वर्णमय भूमि में क्रीडाकर रहे भगवान्‌ श्रीविष्णु के दर्शन हुए । भगवान्‌ श्रीविष्णु से अनुपम ज्ञान (ब्रह्मविद्या) प्राप्तकर उसी स्वर्णभूमि में पाँच वर्ष तक वह समाधि में रहा