Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 127, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 28
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हिन्दी अर्थ
उस जगह से वह लोकालोक महापर्वत के दूसरे भाग में गया,
जहाँ अन्धकार ही अन्धकार है चारों ओर परिखाकार बड़ा भारी गड्ढा है जो आकाश के समान सब
प्राणियों से शून्य तथा अनेक योजन विस्तृत हे