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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 127, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

यद्यथा यावदाभाति चिति चित्त्वात्स्वभावतः । तत्तथा तावदाभाति तत्र तत्र तदात्मकम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

तीसरे विपश्चित को कोई विद्याधर इन्द्र सभा में ले गया, वहाँ प्रणाम न करने से क्रुद्ध हुए देवराज इन्द्र के शाप से वह भस्म बन गया