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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verses 6–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 127, verses 6–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 6-8

संस्कृत श्लोक

तिमिराक्रान्तनेत्रस्य केशोण्ड्रकमिवाम्बरे । चिन्मात्रस्य महीगोलो यो भातः स तथा स्थितः ॥ ६ ॥ ऊर्ध्वं वहन्त्यः सरितस्तदधस्ताद्हुताशनः । चिति चेत्स्वप्नवद्भाति तत्तथा तत्स्थितं भवेत् ॥ ७ ॥ तस्मात्पतन्ती भूर्भाता पतत्येवानिशं जगत् । उत्पतन्ती तु चिद्भाता तथा नानात्मिका भवेत् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

चौथे विपश्चित्‌ के, जो कुशद्रीप पर्वतवर्ती नदी के दलदल में सतर्कता से चल रहा था, जबर्दस्त मगर ने आठ टुकड़े कर दिये अतएव बेचारा मृत्यु को प्राप्त हुआ इस प्रकार दिगन्त में व्याकुल बुद्धिवाले वे चारों राजा (विपश्चित्‌) ऐसे ही मृत्यु को प्राप्त हुए जैसे कि कल्पान्त में चारों दिशाओं में आकुलबुद्धिवाले लोकपाल विनाश को प्राप्त होते हँ । मरने के अनन्तर आकाशरूपी उन विपश्चितो की संवित्‌ ने आकाशात्मा बनकर पूर्वजन्म के संस्कार से आकाश में पृथ्वीमण्डल पूर्वजन्म की भोति देखा