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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verses 9–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 127, verses 9–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 9-11

संस्कृत श्लोक

स्तब्धभाता स्थिता स्तब्धा सालोका तु प्रकाशिनी । निरालोका निरालोकलोकानामात्मनि स्थिता ॥ ९ ॥ चिद्भानैकानुसारेण ताराचक्रं तथा मही । असदेव सदैवेदं भातीदमविखण्डितम् ॥ १० ॥ आलोकालोकमेवाथ नभःखातं ततो महत् । तम एकार्णवाकारं स्थितं तत्र क्वचित्क्वचित् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके रोंगटे थे, प्रलय की समाप्ति तथा सृष्टि के आरम्भ में जैसे प्रथम सर्जे गये प्रजापति विशाल दिगन्तों को पूर्वकल्प के सदृश ही देखते हैं वेसे ही उक्त संवित्‌ ने विपश्चितों के चारों शरीरों को पूर्ववत्‌ देखा