Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 128, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
जलाद्दशगुणं बाह्ये स्थितं तेजो निरिन्धनम् ।
आकाशविशदं शान्तस्तब्धज्वालोदरोपमम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार सत्वादी तथा असत्वादियो का चिद्भान के अनुसार सौरपरिवार तथा पृथ्वी मण्डल
वैसे ही (सत् अथवा असत्) है, ऐसा कहते है ।
केवल चिद्भान के अनुसार यह सारा का सारा नक्षत्र-मण्डल तथा पृथिवी असत् ही अथवा सत्
ही प्रतीत होती हे