Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 128, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
तस्माद्दशगुणो बाह्ये संस्थितो वायुरायतः ।
वायोर्दशगुणं बाह्ये व्योम तिष्ठति निर्मलम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
दो प्रश्नों का उत्तर हो चुकने पर तृतीय प्रश्न का उत्तर देते है।
यह पृथिवी लोकालोक पर्वत तक व्याप्त है । बस इतना ही इसका परिमाण है उसके अनन्तर
वलयाकार (गोल)गङ्ढा है ओर उसमें एकमात्र समुद्राकार महान् अन्धकार स्थित है । कीं - कहीं पर
(लोकालोक पर्वत के दो शिखरो के मध्य में) थोडा बहुत धूप का भी प्रवेश हे