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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 128, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 128, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

तावन्मात्रप्रबोधोऽसौ नाधिकं बोधमागतः । चिन्तयित्वाऽसितं कार्यं बभूव प्रकृतेर्हितः ॥ २० ॥ श्रीराम उवाच । अदेहं प्रसरत्येतच्चित्तं कार्ये कथं मुने । आतिवाहिकसंवित्तेर्बोधः स्यात्कीदृशोऽधिकः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

उस आकाश के आखिरी छोरपर ब्रह्माण्डकपाल है । उनमें एक कपाल ऊपर है और एक नीचे है। इन दोनों के बीच में आकाश है