Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
तयोर्द्वयोर्मुनिश्रेष्ठ संपन्नं किमतः परम् ।
पश्चाद्विपश्चितोस्तस्य रुद्धयोर्वै विपश्चितोः ॥ १ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
तयोरेकश्चिराभ्यस्तवासनाविवशीकृतः ।
भ्रमन्द्वीपेषु देहौघैस्तामेव पदवीं गतः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि श्रीरामजी की ओर से यह आशंका हो कि ज्योतिश्चक्र तथा उसके विस्तार आदि का परिज्ञान
आपको किस प्रमाण से हुआ तो इस पर कहते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, हमारे सदृश योगी जनों को योग ज्ञानाभ्यास से शोधित जो
शुद्ध तत्त्वबोध यानी सर्वजगत् तत्त्वसाक्षात्कार है, तद्रूप आतिवाहिक शरीर से इन सबका प्रत्यक्ष होता
है। आधिभौतिक स्थूलरूप से प्रत्यक्ष या अनुमान नहीं होता है। यह जो मैंने लोका-लोक, ज्योतिश्चक्र
आदि का अवयवसंगठन आपसे कहा, वह स्वयं दृष्ट जगत्स्वप्न में प्रसिद्ध है अन्य लोगों द्वारा दृष्ट
जगत्स्वप्नों में प्रसिद्ध मैंने नहीं कहा । अन्यान्य ब्रह्माण्डान्तरों के जगत्स्वप्नों में भी ऐसी ही स्वभावतः
स्थिति (अवयवसंघटना) है ओर कहींपर इससे विलक्षण भी है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ सत्ताईसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अद्जाईसवाँ सर्ग अन्धकारपूर्ण गड्ढे को तथा ब्रह्माण्ड के आवरणों को पारकर विपश्चितों का अविद्या में भ्रमण का वर्णन ।