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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

तथैवावरणांस्त्यक्त्वा परमाकाशकोटरे । पश्यन्संसारलक्षाणि तथैवाद्यापि संस्थितः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि श्रीरामजी कहें कि यदि अन्याय ब्रह्माण्डों का स्वरूपगठन विलक्षण है, तो उसे भी कहने की कृपा कीजिये, इस पर कहते हैं। अन्यान्य जगत्स्वप्नों के अवयवसंगठन के वर्णन से यहाँ क्या प्रयोजन है ? बुद्धिमान्‌ पुरुषों को उपयोगी बातों के सिवा और बातें नही रुचतीं