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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

तयोर्द्वितीयः स्वाभ्यस्तादादावासंगतेर्वशात् । त्यक्तवान्प्रभ्रमद्देहैरद्य शैले मृगः स्थितः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे पण्डित लोगों, उस उत्सर्ग से सब ब्रह्माण्डों के मध्य में सब द्वीप और सागरों की उत्तर दिशा में मेरु पर्वत है, लोकालोक पर्वत दक्षिण दिशा में है। इस प्रकार समस्त भूतसमूह के विषय में जिनकी जिज्ञासा है, उनका अनुमान हो