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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 129, Verses 5–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 129, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 129 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । एकैव वासना ब्रह्मन्या चतुर्णां सदोदिता । नानातां सा कथं प्राप्ता हीनोत्तमफलप्रदाम् ॥ ५ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । स्वभ्यस्ता वासना जन्तोर्देशकालक्रियावशात् । तनुदार्ढ्यान्यतामेति घनदार्ढ्यैति नान्यताम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

जो अवान्तर विशेष हैं, उनका वहाँ के रहनेवाले लोग ही प्रत्यक्ष करते हैं यहाँ के रहनेवालों को उनका प्रत्यक्ष नहीं होता, ऐसा कहते है । वहाँ पर जो और ओर जगद्भ्रम हैं, उनका वहाँ के निवासियों को प्रत्यक्ष होता है। उस तरह की अपनी अवयवरचना से शोभित होनेवाले वे हम लोगों के प्रत्यक्ष के विषय नहीं हैं । सब द्वीप और सागरों के उत्तर में मेरु पर्वत है और दक्षिण में लोकालोक पर्वत है, ऐसा निश्चय सात द्वीपों में रहनेवालों का ही है, ब्रह्माण्ड से बाहर रहनेवालों का ऐसा निश्चय नहीं है